वक्त ऐसा भी नहीं कि मेहरबाँ होने नहीं देता
बस जहाँ ज़रूरत हो, वहाँ होने नहीं देता
आदम की तरक़्क़ी का भी अजब जलवा है
ये पानी, ज़मीं और आसमाँ होने नहीं देता
इस जहाँ की यही रीत है कि अपनी जवानी में
चमन भी बागबाँ को बागबाँ होने नहीं देता
ये " अपना मज़हब, अपना अदब ", क्या है
जो आदमी-आदमी को हमज़बाँ होने नहीं देता
ज़माने की अपनी रफ्तार है, काँधा तो छोड़िये
ये ठहरने वालों के लिए कारवाँ होने नहीं देता
सुनो, तुम जान जाया करो तजुर्बों से अपने
मैं मेरा हाल चेहरे से बयाँ होने नहीं देता
– रजनीश्वर चौहान ' रजनीश '


