सबब कोई पूछता है

तो उलझा दिया करता हूँ यहाँ-वहाँ की बातों में

आसां भी तो नहीं होता

रिश्तों में पड़ी सीलन की वजह को बयां कर पाना

गर होता

तो धूप को कोस लेता

और बरसात पे इल्ज़ाम धर देता


– रजनीश्वर चौहान ' रजनीश '