पाक हैं धागे सबके, पर पिरोना छोड़ दिया
है अक़ीदत भी मगर मुहब्बत संजोना छोड़ दिया
सब आकाओं के छप्पर तले सूखा-पसंद हैं
सावन बदनाम है कि उसने भिगोना छोड़ दिया
यूँ ठहाकों से हँसा गई फ़रेबी कि शराफ़त ने
दामन-ए-हस्सास का कोना छोड़ दिया
ये किस गर्द में खींच ले आई है सियासत इस दौर
कि लोगों ने मय्यतों तक पे रोना छोड़ दिया
सो जाते हैं बेफ़िक्र ही अब शब-ए-क़यामत में
वो जो कहते थे कभी कि सोना छोड़ दिया
बहला रहा हर शख़्स तमाशे में, ज़ख़्म भूल गया
घाव भरता कैसे, सबने घाव धोना छोड़ दिया
जाने कब देखेंगे हुक़ूमत तमाशाई गिरती तेरी
कब देखेंगे कि तूने जादू-टोना छोड़ा दिया
क्यों रहती फ़स्ल-ए-गुल, कैसे चमन रहता
जब बागबाँ ने ही खुद बागबाँ होना छोड़ दिया
उग आएगी फ़सल-ए-मोहब्बत यहीं, इसी मिट्टी में
वो मुग़ालते में हैं कि सबने बोना छोड़ दिया
– रजनीश्वर चौहान ' रजनीश '


