मैं चला, चलता रहा, और चला ही रहा 

पर मेरा, मेरे-आप से फ़ासला ही रहा 


बाद सफ़र के मिले जो भी चारागर मिले मुझे 

राह में साथ तो मेरे आबला ही रहा


उससे मिलना धीमे कम, फिर ख़तम हो गया 

फिर इंतज़ार-ओ-सितम का सिलसिला ही रहा 


नई-नई सुबह वो बुझा आफ़ताब होने लगा

कई-कई रात मैं भी जला-जला ही रहा


कुछ मेरा हाल भी था जिसपे मेरा ज़ोर न चला 

हाल को भी मेरे मुझसे गिला ही रहा 


मैंने सलीक़ा भी निभाया पर न निभी किसी से 

क्या कहूँ हर जगह ये मामला ही रहा 


हैं यूँ भी जिये अब तक रख हौसला ही ' रजनीश '

होगा और भी जीना जो हौसला ही रहा             


 – रजनीश्वर चौहान