इंतिहा ख़ैर कि मेरे सर तेरे ख़यालों का बसर होता है
वरना तेरा साथ होना कहाँ किसीको मयस्सर होता है
न पहले, न बाद, न रात, न सहर सुकूँ मुख़्तसर होता है
किसी से मिलना-बिछड़ना भी कितना बा-असर होता है
किस किनारे बैठें, किसे ताकें, किस से लिपटा करें
अब यहाँ न दरिया, न फूल, न वो, न भँवर होता है
कहे माने पे है ये अपना चलना, ठहरना, ये जिये जाना
सुनते हैं तक़दीर बदलती है, सुनते हैं मुक़द्दर होता है
काँधे, आसन-ए-बाज़ू पर से कहाँ जाना गया हमसे
जब खुद राह निकले तो जाना कि क्या सफ़र होता है
चार बातें हाज़िर जवाबी को सीख लेंगे ऐ दिल-ए-नाकाम
ऐसा होता है, वैसा होता है, अगर होता है, मगर होता है
क्या सर चढ़ाएं ' रजनीश ', क्या ग़म करें कामयाबी का
ये ख़िताब-ए-ज़िन्दगी है, कभी इधर, कभी उधर होता है
– रजनीश्वर चौहान ' रजनीश '


