हाँ, यहीं की बात है जहाँ सत्ता कुटिया लूट जाती है
कहीं घर मिट्टी होते हैं, कहीं पुलिया टूट जाती है
मुलाज़िमी लेट जाती है टाई-सूट-बूट के आगे
और गरीबों को दारोगा की लाठियाँ कूट जाती है
वहाँ बारिश न रुके तो शिकन ही आती है पेशानी पे
यहाँ एक फसल टूटती है तो छातीयाँ फूट जाती है
अभी नन्हीं सी है तो इंतज़ार में रहा करती है
बापू घर देर से आये तो वो बिटिया रूठ जाती है
सब्र, पहाड़, हौसला क्या है उस औरत से पूछिये
जिसकी चूड़ियाँ टूट जाती हैं, बिंदिया छूट जाती है
– रजनीश्वर चौहान ' रजनीश '


