अब कुछ यूँ कर कि यूँ मिल मुझसे
अबके मिल तो हू-ब-हू मिल मुझसे
कब तलक छुपाएगी रुख़ ए हयात
सवाल कई हैं रू-ब-रू मिल मुझसे
अरमाँ मेरे मैं निहत्थे लेता आऊँगा
है गर तेरा इरादा-ए-खूँ मिल मुझसे
चिरैया आँगन से उड़ी फिर न लौटी
रवाना हुई थी कू-ब-कू मिल मुझसे
तू बाग़ मेरा ले जा बस गुल न माँग
वह माँगते हैं रंग-ओ-बू मिल मुझसे
पता न ' रजनीश ' मुझे अपना बता
ये कह गई मेरी जुस्तजू मिल मुझसे
– रजनीश्वर चौहान ' रजनीश '


