कौन कहे उसे, ये वो नहीं, उनकी नजरों ने इनायत कर रक्खा है ।।
वो जमाना ओर था जब थोड़ा सोना, साथ रोना वाजिब था,
आज ज्यादा जग भी गए तो कयामत कर रक्खा है।।
मेरी आंखों को ....
अंगुली पकड़कर साथ चलना, खेलना, खिलखिलाना कल तक तो कामिल था ।
रुसना, रुसाना फिर मनाना मेरी आदतों मे शामिल था।।
मैंने सोचा चोट यहाँ है, दर्द वहाँ भी तो होगा ,
पर अब की बात और है, पहले जाहिल और अब पागल कह रक्खा है।।
मेरी आंखो को....
जब सुबह थी तो साथ और भी थे, शाम तो होनी है।
मई तो जुगनू हूँ, कहाँ पता था उसे चिरागों के साथ सोनी है।।
अंधेरा घना था, कोशिश खूब की उसे मिटाने की ,
खैर वो खुश है, सुना है किसी गैर को घर कर रक्खा है।।
मेरी आंखो को .....
