मेरी तन्हाईयों के सूखे होंठ,
तुम्हारी यादों के पानी को,
घूंट घूंट पीते हैं,
पर ये क्या बात है जान,
न होंठ गीले होते हैं,
न तेरी यादों का पानी खत्म,
प्यास उसी तरह बरकरार,
मैं क्या करूँ .....


मेरी तन्हाईयों के सूखे होंठ,
तुम्हारी यादों के पानी को,
घूंट घूंट पीते हैं,
पर ये क्या बात है जान,
न होंठ गीले होते हैं,
न तेरी यादों का पानी खत्म,
प्यास उसी तरह बरकरार,
मैं क्या करूँ .....