तस्वीर में तो हैं पिता,पर याद में क्यूं नहीं,
बहुत कुछ उनका है मुझमें,पर सबकुछ क्यूं नहीं।
एकसाथ खड़े हों बच्चे,पिता को मुकम्मल करें,
सोचते तो सब हैं,मगर होते क्यूं नहीं।
तड़पते हैं सीने पिता के,बेटों को गले लगाने को,
इतनी सी बात बेटों को समझ आती क्यूं नहीं।
किस तरह पाला है इनको,सोचता है तन्हा पिता,
उसकी ये आह बेटों तक पहुँचती क्यूं नहीं।
कल बहुत गीत थे,चित्र थे,फूल थे,आज शेष कुछ नहीं,
पिता हमारी यादों में सदा रहते क्यूं नहीं।
--- रजनीश---
