बहुत पहले की बात नहीं है...

तुम आतीं थी रोज, 

मेरे पास.....

घंटों बतियाति,

खिलखिलाती, 

रूठती कभी खुद ही, 

और खुद ही मान भी जाती, 

तेरे बदन की खुशबू, 

बालों का रेशमीपन,

याद है मुझे.....

मैं कहता जाओ, 

तो झगड़ती थी मुझसे, 

मनाने पर मान जाती थी झट से,

कितने नामों से बुलाती थी मुझे, 

चाय मुझसे बनवाती सुबह की, 

दिन भर बना कर, 

नये नये पकवान खिलाती ।


फिर क्या हुआ, 

पता न चला, 

तुम रूठी मुझसे, 

या मैं मसरूफ हुआ,

पर एक बात तय है, 

तेरा आना कम हुआ, 

आतीं भी, बातें न होती, 

पहले जैसी तकरारें न होती, 

न रहा पहले सा रूठना, मनाना, 

न कहना तेरा मुझसे....

सुबह की चाय बनाना, 

न जाने क्या बात हुई थी 

कुछ याद नहीं।


क्यूँ याद नहीं ....

कब मिली थी तुम आखिरी बार, 

कब साथ गुनगुनाए थे गीत हमने, 

मैंने चाय कब बनाईं, 

तुम्हारे लिए आखिरी बार....

क्यूँ याद नहीं, 

तुम मिलती रही मुझसे, 

लगातार हर रात, 

मेरे ख्वाबों में, 

बिना नागा...

मुझे लगा ही नहीं 

बिछुड़ गया हूँ तुमसे, 

पर आज तुमने हद कर दी, 

ख्वाबों में आना भी बंद कर दिया। 


ये तो गलत बात है।