चेतना लुप्त.....
सम्वेदनाएँ सलेक्टिव...
राइट और लेफ्ट....
दोनों तरफ हुआ पक्षाघात....
जान नहीं पाता हूँ,
किस तरफ देखूँ मैं...
मुट्ठी तनी दोनों ओर,
तकिए में मुंह छुपा,
रो भी नहीं पाता हूँ।
बौद्धिक समर है,
मेरा मरण है.....
दोनों तरफ .....
जान नहीं पाता हूँ,
दोनों तरफ से दोहरी मार खाता हूँ ।
खेल भी तुम्हारा,
खिलाड़ी भी तुम्हारे है,
रेफरी बनकर,
खून मेरा कर डाला है,
समझ न आया जीवन भर,
यह क्या गड़बड़ झाला है,
दम निकल गया यही चिल्लाते
हाय मार डाला है.....
हाय मार डाला है।


