गलती भी नहीं की ,गुनेहगार भी नही हुआ क्या ऐसा जो सजा मुझको दी गयी , मेरे संसकारो की चढ़ी चादर थी मुझपे तेरे एक तरफ़ा प्यार का शिकार हो गयी, वो भोली सी सूरत थी मेरी ,वो आँखों में नमी भी, होठो पे दबी दबी मुस्कुराहट  थी कही, ये क्या किया तूने सब खत्म कर दिया मेरी पहचान को ही तूने धूमिल सI कर दिया ये जूनून था प्यार का ,या आग नफरत की तूने तेज़ाब डाल के अपनी औकात बता दी, मेरे मासूम से चेहरा  की  भी हसरत थी कोई दरिंदगी से उसकी सब हसरत मिटा दी ले आता खंज़र हाथो में तो डर न होता इस तेज़ाब से मेरा चेहरा तर न होता, मै तेरे बारे में कल भी सही आज भी मेरे साथ थे संस्कार   …. तेरी परवरिश में ही कमी थी…