ग़मे ज़िन्दगी से हैरान सा है थक गया है ज़िन्दगी की आपाधापी से गुनेहगार सा लगता है खुद अपनी ही आँखों में उठती है टीस रह रह कर इस गमे ज़िन्दगी में हुआ कुछ नहीं हासिल इस गेम ज़िन्दगी में होके मायूस हर शाम को लौट आता हूँ घर के कोने में जा के बैठ जाता हूँ मिलकर साथ तन्हाईया मेरी एक सवाल पूछती है आज क्या नया खोया इस गमे ज़िन्दगी में