युग बदला, हम ना बदले।।

 

गौर करो तुम देखो जरा, हर युग की एक ही भाषा रही,

कोई फिरे बन रावण तो किसी को राम की आशा रही।

 

अच्छे बुरे का भेद नहीं, बस समय बदलता आशय है,

सबल यहां जो कह जाये, सत्य की वही परिभाषा रही।

 

एक कहानी एक समय दो व्यक्ति कार्य अपितु एक था,

कृष्ण बने भगवान, वहीं दुर्योधन के हाथों निराशा रही।

 

ज्ञानश्रोत तब भी बहता था, आज भी अविरल धार है,

अंजुरी थी छेद भरी और व्याकुल मन की पिपासा रही।

 

तब भी था कोई रास रचाता, कोई भूख से मरता था,

जो दिखा आज, कल भी ठोकर खाती अभिलाषा रही।

 

नारी शक्ति का दम्भ जो है, ना कल था ना आज हुआ,

क्या बदला है, तब भी द्रौपदी शकुनि का ही पासा रही।

 

बस मानव का देह लिए, पशुओं सा ही व्यवहार हुआ,

लिखने को तो लिख डालूँ, पर मन मे ये जिज्ञासा रही।

 

©रजनीश "स्वछंद"