
तुम्हे उठ ख़ुद ही चलना होगा।।
सांत्वने का दौर नहीं, तुम्हे उठ ख़ुद ही चलना होगा।
कोई है अवतार नहीं, तुम्हे बढ़ खुद ही लड़ना होगा।
शकुनि से भरा संसार है, पग पग खड़ा है कंस भी,
मुंह बाए कहीं है कालिया, जहरीला बड़ा है दंश भी।
ग्वाल बालों की क्रिया से अब हो जरा निवृत चलो,
जागने की बेला है आई, है सुबह, अभी तुम ना ढलो।
हर युग मे महाभारत रहा, तुम्हे कृष्ण बनना चाहिए,
लहु बड़ा अनमोल है, मनुज सेवा में बहना चाहिए।
छोड़ शय्या फूलों की तुम्हे कांटों पर ही पलना होगा।
सांत्वने का दौर नहीं, तुम्हे उठ ख़ुद ही चलना होगा।
कोई क्यूँ है भूखा रोता रहा, अस्थियों का पंजर लिए,
क्यूँ डबडबाई सी आंख है, आंसुओं का समंदर लिए।
मन द्रवित होता नहीं क्यूँ, बस स्वार्थ सर चढ़ बोलता
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