तुम्हे उठ ख़ुद ही चलना होगा।।
सांत्वने का दौर नहीं, तुम्हे उठ ख़ुद ही चलना होगा।
कोई है अवतार नहीं, तुम्हे बढ़ खुद ही लड़ना होगा।
शकुनि से भरा संसार है, पग पग खड़ा है कंस भी,
मुंह बाए कहीं है कालिया, जहरीला बड़ा है दंश भी।
ग्वाल बालों की क्रिया से अब हो जरा निवृत चलो,
जागने की बेला है आई, है सुबह, अभी तुम ना ढलो।
हर युग मे महाभारत रहा, तुम्हे कृष्ण बनना चाहिए,
लहु बड़ा अनमोल है, मनुज सेवा में बहना चाहिए।
छोड़ शय्या फूलों की तुम्हे कांटों पर ही पलना होगा।
सांत्वने का दौर नहीं, तुम्हे उठ ख़ुद ही चलना होगा।
कोई क्यूँ है भूखा रोता रहा, अस्थियों का पंजर लिए,
क्यूँ डबडबाई सी आंख है, आंसुओं का समंदर लिए।
मन द्रवित होता नहीं क्यूँ, बस स्वार्थ सर चढ़ बोलता।
आंखें तू अपनी मूंद कर, क्यूँ मन को नहीं है टटोलता।
कौन तेरा अपना रहा, किसी से रहा पराये का भेद क्यूँ,
किसी के दर्द में रोया बहुत, किसी पर हुआ ना खेद क्यूँ।
आंसू पोछने को इनके, अविरल तुम्हे ही बहना होगा,
सांत्वने का दौर नहीं, तुम्हे उठ ख़ुद ही चलना होगा।
सीख क्या मैं दूँ तुम्हे, तुम ज्ञानी विवेकी बलवान हो,
अंदर तुम झांको जरा, ख़ुद का तुम ही तो सम्मान हो।
जीवित किस ख़ातिर हो तुम, अहसान किसका रहा,
तुम भी मनुज, मैं भी मनुज, अभिमान किसका रहा।
रहा कोई अब देव नहीं, दानव भी कहाँ अब शेष है।
दोनों हैं तुझमे ही, मनुज ही लिए देव दानव भेष है।
बन देव, दानवों को, तुम्हे उठ ख़ुद ही दलना होगा,
सांत्वने का दौर नहीं, तुम्हे उठ ख़ुद ही चलना होगा।
©रजनीश "स्वछंद"


