तुम्हे प्रह्लाद बनना चाहिए।।
है समय की मांग ये, तुम्हे प्रह्लाद बनना चाहिए।
मनुज मुस्कान दानवों का अवसाद बनना चाहिए।
अत्याचार की होली जले,
व्यभिचार की होली जले,
भ्र्ष्टाचार की होली जले,
कुविचार की होली जले।
दानव जले और तम जले,
दुख जले और मातम जले।
मूक इस संसार मे, तुम्हे संवाद बनना चाहिए।
है समय की मांग ये, तुम्हे प्रह्लाद बनना चाहिए।
तुम बहुभुज तुम सबल,
तुम में है संसार सकल,
तुम हो अग्नि तुम ही जल,
तुम पवन तुम दावानल।
चेतन तुम्ही, संहारक हो तुम,
मनु संतति के वाहक हो तुम।
अब इस समर का तुम्हे शंखनाद बनना चाहिए।
है समय की मांग ये, तुम्हे प्रह्लाद बनना चाहिए।
सुनी हो न कोई गोद अब,
सुखा रहे न जलश्रोत अब,
शिथिल पड़े न ये क्रोध अब,
सब खुशी से ओतप्रोत अब।
रख मान अब तू इस धरा की,
ले छीन शक्ति तू अब जरा की।
है यज्ञ ये पूजा यही, तुम्हे प्रसाद बनना चाहिए।
है समय की मांग ये, तुम्हे प्रह्लाद बनना चाहिए।
©रजनीश "स्वछंद"


