तुमसे क्यूँ दूर रहा मैं।।

 

खुद से ही मजबूर रहा मैं,

पास तेरे कभी दूर रहा में।

 

दोष तुम्हे दे दूं भी कैसे,

खुद में ही मगरूर रहा मैं।

 

कब आयी सुबह कब रात हुई,

अपने ही नशे में चूर रहा मैं।

 

तू पास नहीं कुछ भी तो नहीं,

बस महफ़िल में मशहूर रहा मैं।

 

ज़िंदा रहूँ या मर जाउँ मैं,

दिल मे तेरे जरूर रहा मैं।

 

ना तुम ज़ालिम ना जलिम दुनिया,

दे अपना ही कुसूर रहा मैं।

 

आ भी जा अब देर न कर तू,

ले छोड़ ये अपना गुरूर रहा मैं।

 

©रजनीश "स्वछंद"