तो क्या, लड़ना छोड़ दोगे।।   हर राह पे कांटें हैं, क्या चलना छोड़ दोगे, है मुश्किल वक़्त, क्या लड़ना छोड़ दोगे।   बिन जले दिया भी कहाँ रौशनी दे पाती, बुझने के डर से, क्या जलना छोड़ दोगे।   हीरे की चमक भी तराश के दर्द से आती, सूरज के डर से, क्या चमकना छोड़ दोगे।   मौसम एक सा होता नहीं, बदल जाता, पतझड़ के डर से, क्या महकना छोड़ दोगे।   आदि-अंत तो हैं दो पहलू ज़िन्दगी के ही, मौत के डर से, ज़िंदा रहना छोड़ दोगे।   हर रात की होती है देखो एक सुबह भी, ढलने के डर से, क्या उबरना छोड़ दोगे।   चलो करते हैं गुमां ख़ुद के इंसां होने का, दानवों के डर से, इंसां बनना छोड़ दोगे।   ©रजनीश "स्वछंद"