स्वछन्द दोहे


दुख अपना क्यूँ वाचना, कौन रहेगा साथ।

आप बचाये राखिये, निज पगड़ी निज हाथ।।।


कथा कहो मत दर्द की, रख लो जिह्वा दाग।

ये दुनिया तो बावली, निज डफ़ली निज राग।।


पोथी सब पन्ना पढ़ा, समझ न आया सार।

ज्ञान खड़ा ज्यों कह रहा, बैल मुझे आ मार।।


बैरन मूरख ज्ञान है, व्यर्थ परिश्रम अपार।

पैरों पर अपने सुनो, दियो कुल्हाड़ी मार।।


अपनी धुन मंज़िल मिले, व्यर्थ नहीं दो कान।

अंत भला तो सब भला, जानो इतना ज्ञान।।


सुनी सुनाई बात जो, अपना आपा खोय,

कान भरा जो खुश रहा, उल्लू सीधा होय।


कान भरण जिन काम है, काहे तू पतियाय।

निज टेटन देखा नहीं, ज्ञान बघारे जाय।


मूढ़ विनय कब जानता, अहम रहा जो पाल।

जैसे चोर न मानता, डाँटता कोतवाल।।


मोल न जाने ज्ञान का, अकड़ दिखाये तैश।

उनको मत बतला चलो, अक्ल बड़ी या भैंस।


©रजनीश "स्वछन्द"