शापित है ये लहू हमारा, शापग्रस्त मनोविचार है। कुंठित पड़ी है आत्मा, कलुषित जीवनधार है।।   किस मुख लेखन का करूँ अभिनंदन, किस मुख निजमन की बात करूँ। हर मुख ताले जड़े चुप्पी के, किस किस दुख पे आघात करूँ।   है अनुकम्पित हर प्राणी यहां, कुच्छ निज के कुच्छ औरों के बोझ तले। विषव्यापीत है विनय सवज्ञा, बाजार है, कारोबार यही हर रोज़ चले।   अपनो की परिभाषा बदली, मन भी मन का निरादर करता है। किस ओर चलूं, अपने को ढूंढूं कहाँ, छुप जाने को ये लंबी चादर करता है।   कहने को मनु की ये संतति, मनुज कर्मों से ही खीझ पड़ा है। काटो तो लहू का कतरा नही, आंखें खोले जैसे निर्जीव खड़ा है।   समय सारथी ले चला इसे, घुटनों बल चलने का आडम्बर कैसा। स्वप्न संकुचित, मलीन सोच, फिर तेरी धरा ये कैसी, ये अम्बर कैसा।   भीष्म तूणीर शय्या पे लेटा, मानव धृतराष्ट्र बना है घूमता। धर्मराज भार्या दांव में हारे, दम्भ दुर्योधन सा झूमता।   है पौराणिक महाभारत नही, बस युग ने कथा को बदला है। अब लिए कर चीर कृष्ण नही, द्रौपदी तो अब भी अबला है।   जिसकी लाठी भैंस उसी की, बली अत्याचार है। कुंठित पड़ी है आत्मा, कलुषित जीवनधार है।। ©रजनीश "स्वछंद"