साख से टूटा पत्ता हूँ।।
साख से टूटा मैं पत्ता हूँ, आधार अपना हूँ ढूंढ रहा।
बदली से बरसते पानी का मैं तो बस एक बूंद रहा।
ख़बर नहीं है अपनी मुझे, हवा संग चल मैं पड़ता हूँ,
हर पतझड़ के मौसम में, साख से यूँ ही मैं झड़ता हूँ।
कल तक जो थे साथ मेरे, हो हरे अभी भी जमे रहे,
मैं ही एक विषम निकला, बाकी साखों संग थमे रहे।
कुदरत की मार क्यूँ मुझ पर, क्यूँ ऐसा अन्याय हुआ,
अभी तो साख से टूटा था, क्यूँ परायों का पर्याय हुआ।
जिस साख से मैं जुड़ा रहा, था वही क्या ठूंठ रहा।
साख से टूटा मैं पत्ता हूँ, आधार अपना हूँ ढूंढ रहा।
उन जैसा बन न सका, बस मिट्टी पानी से सना रहा,
हवा के झोंके में भी क्यूँ मैं अड़ा रहा और तना रहा।
टूट गिरा जो धरती पर, अफसोस रहा जरा भी नहीं,
गर्व रहा दिल को इतना कि झोंकों से डरा ही नहीं।
झुक के जीने में संतोष कहाँ, दीनहीन हो जीना क्या,
एक पल की मौत भली, घूंट अपमान का पीना क्या।
गर्व से मरना सीखा मैंने, ये लहु नहीं था कुंद रहा।
साख से टूटा मैं पत्ता हूँ, आधार अपना हूँ ढूंढ रहा।
©रजनीश "स्वछंद"


