फूल।।
उगने पर भी है फूल चढ़े,
ढलने पर भी है फूल चढ़े।
हर एक कदम की गाथा है,
चलने पर भी है फूल चढ़े।।
ले डली चली फूलों वाली,
दुल्हन के गालों की लाली।
सोना भी फूल बना देखो,
सजता देखो बन कनबाली।
ये फूल सुनो बलिदानी है,
वीरों की एक कहानी है।
परिवार सखा सरहद सुन लो,
खूँ बन ये बही रवानी है।
यौवन का जलवा फूल सुनो,
डाले आँखों में धूल सुनो।
इकरार तरीका ये भी है,
कहते जिसको सब भूल सुनो।
है देश बना फुलवारी ये,
बातें सच्ची क्या सारी ये।
कहते कहते हम थके नहीं,
किसकी है ज़िम्मेदारी ये।
नेता जीता माला धारे,
वो जीत गया पर हम हारे।
किसने सोचा कब सोच रहा,
ले चले पताका हम सारे।
घर में जो मातम छाया है
अर्थी फूलों से सजाया है।
हो बाल वृद्ध यौवन जीवन,
फूलों ने सबक बताया है।
गाथा अनन्त फूलों की है,
पत्थर काँटे शूलों की है।
धड़ शीश कटा तो फूल चढ़ा,
बागों के भी झूलों की है।
मैं रंगहीन ही पुष्प रहा,
काव्य हृदय मैं शुष्क रहा।
दरबारी फूल चढ़े मुझपर,
निज लेखन से पर रुष्ट रहा।
अब जो सच है मैं फूल लिखूँ,
अब भाव ज़रा मैं झूल लिखूँ।
फूलों से सीख ज़रा लेकर,
मैं भी अपनी अब भूल लिखूँ।
मुश्किल कितनी भी आन पड़े,
चलते अपनी हम राह गढ़े।
सच को तो सच अब होना है,
विश्वास धार हम आज अड़े।
उगने पर भी है फूल चढ़े,
ढलने पर भी है फूल चढ़े।
हर एक कदम की गाथा है,
चलने पर भी है फूल चढ़े।।
©रजनीश "स्वछन्द"


