चलो अब घर को जाएं।।   रात काली हो चुकी है, रवि भी पड़ा है स्याह, झींगुरों का स्वर स्याह को है भेदता, चलो अब घर को जाएं।। गांव की टूटी पगडंडिया, करते पांव टिकाने का प्रयास, रौंदता हरियाली को, करता उनका शीतल आभाष, कांटों की चुभन को झेलता, इस पग को भी कुछ आराम तो दे, जो बढ़ा जा रहा कदमो को फेंकता, चलो अब घर को जाएं।   सर पे बोझा, हाथों में थैला, एक हाथ कमर को थामते, सूक्ष्म सी किसी नस को, उंगलियों से दाबते, दर्द का आभाष भी चरम पे, अपनी गर्मी से ही स्वयं को सेंकता, चलो अब घर को जाएं।   आया था बाजार थोड़ा, घर मे बच्चे खेलते, बांध पोटली में रखा है, उनके भी स्वाद को, स्वतः करते हैं कम, अन्तः करण के अवसाद को, उनकी आंखों की चमक में सूर्य ही तो झांकता, बन रहा एक श्रोत उनके नूतन गान की, स्वयं से स्वयं हूँ झेंपता, चलो अब घर को जाएं।।   आह, पांव फिसले, हाथ छूटे, कमर कहाँ अब टेकता, थैला संभालू या संभालूं बोझ को, स्वाद संभालूं या संभालूं स्वयं के निस्तेज को, बोझ धरती पे पड़ा, थैला पड़ा है हाथ मे, बस प्राण वायु का स्रोत टूटा, कल्पनायें ओझल हुईं, कुछ उत्सुक नैन आंखों में घूमते, खुली आंखें, रहे शून्य को घूरते, और पथिक भी जा रहे, रह गए मुझे बस देखते, सूर्य रश्मि हो रही निस्तेज अब, नूतन गान हृदय को छेड़ते। रहा यमपाश को देखता, चलो अब घर को जाएं।।