नारे तो भैया नारे हैं।।
नारे तो भैया नारे हैं,
चक्कर में पड़ सब हारे हैं।
जिनकी ख़ातिर ये लगते हैं,
वो अब भी तो बेचारे हैं।
नारों से किसका पेट भरा,
है आज पकड़ वो पेट खड़ा।
जर्जर जीवन जर्जर दुनिया,
है पीठ सटा अब पेट पड़ा।
बेटी के भी नारे देखे,
अखबार पकड़ सारे देखे।
जलती बिटिया थी चीख रही,
बैठे निज को मारे देखे।
है भूख दवा पर नारा है,
देखो सूरज या तारा है।
छुपकर तख़्ती बैनर नीचे,
ये देश चला अब सारा है।
रोटी माँगी नारे मिलते,
नेता ऐसे सारे मिलते।
कुंठा कुंठित हो हार गयी,
मानव मानव मारे मिलते।
सच है निर्बल का राज नहीं,
जो साथ चले वो आज नहीं।
हम बस सुनते ही आये हैं,
लाठी है पर आवाज़ नहीं।
है भीड़ बिकी नारे बिकते,
कब सत्य धरा हैं ये टिकते।
है लाश गिरी खुश दुनिया है,
चढ़ लाश सियासत ही खिलते।
बस देखा इंसान सियासी,
ज्ञान पड़ा सड़ रहा किताबी।
किसको किसकी आज फिकर है,
दुनिया तो नारों की प्यासी।
ऐ आज कलम तू नारा लिख,
जो भी घटता है सारा लिख।
दर्पण तू आज दिखा सबको,
आदम जीता या हारा लिख।
देती दस्तक तू आज चले,
तू लिख पढ़ सकल समाज चले।
अब उलझ न जा तू नारों में,
लिख ऐसा दिल में आग जले।
©रजनीश "स्वछन्द"


