मेरी मोहब्बत।।

 

मुहब्बत की ना करना बात यारों,

ज़िन्दगी हार कर आया हूँ।

खुश हो ज़नाज़े में होना शरीक,

दिल को मार कर आया हूँ।।

 

था गुमां बहुत ही मुहब्बत पर,

कुछ हमे कुछ उनको भी।

तिनका तिनका बिखरा आशियाँ,

घर भी उजाड़ कर आया हूँ।।

 

चलता हूँ, रुकता हूँ, हो बदहवास,

किसी ठिकाने की तलाश में।

लौटना हुआ अब मुश्किल बड़ा,

तिल को ताड़ कर आया हूँ।।

 

कुछ अपने भी छूट गए पीछे कहीं,

झटका था हाथ उनका कभी।

कैसे लाश लिए जाऊं लौट फिर,

जां उनपे वार कर आया हूँ।।

 

किस से सच कहूं, क्या क्या कहूं,

खुद ही मैं खुद में उलझा हूँ।

सुहाती नहीं बस अब सूरत कोई,

जो उनको ताड़ कर आया हूँ।।

 

क्या जमीं और क्या ये आसमा,

सब रूठे रूठे से लगते हैँ।

खफा है अपना ख़ुदा भी मुझसे,

उनपे जां निस्सार कर आया हूँ।

 

©रजनीश "स्वछंद"