मौत की दस्तक।।

 

कल, एक लम्हे के लिए,

मानो,

मौत ने दी दस्तक, ज़िन्दगी के द्वार पर।

असहाय होना स्वयम का,

लाचार,

पल भर की जंग, जीत और हार पर।

 

आंखों के आगे अंधेरा,

आती जाती गाड़ियों की रौशनी,

मुझे चिढ़ाती हुई।

दीख नहीं पड़ रहा था कुच्छ,

बस तस्वीरें अपने परिवार की,

आंखों में झिलमिलाती हुई।

 

एक पल को,

ऐसा लगा मानो,

ज़िन्दगी अलविदा कह रही हो।

तकलीफ़ अब,

मन में नहीं,

मानो रुधिरों में बह रही हो।

 

क्या खोया क्या पाया,

सारी गणना,

अन्तःकरण में प्रवाहित।

किसी सुनामी के बाद,

मेरा, तेरा, सबका,

सब प्रलय धारा में समाहित।

 

पसीने की बूंदे,

ललाट से निकल,

गालों को छूती, गले तक सरकती।

मौत धीरे धीरे,

अपना रस्ता बनाते,

हरने प्राण, आगे को बढ़ती।

 

सुधबुध था खोया,

फिर भी एक ख्याल रहा,

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।

शांत पड़ती सांसों में,

जो एक किरण थी बाकी,

देती ताकत सांसों को, था अपनो का प्रीत।

 

बस ढलने ही वाला था,

तभी, कुछ पानी की बूंदें,

बंजर जमीन को ज़िन्दगी देने बरसीं।

आंखें खुलीं, देखा कुछ,

मेरी बेटी पानी लिए खड़ी थी,

देख चेहरा, जीने की उम्मीदें चहकीं।

 

मौत से एक छोटी मुलाकात,

फिर से इस दुनिया मे,

जी रहा हूँ, ज़िंदा हूँ मैं।

पर, कुछ पलों ने,

इतना तो सिखला ही दिया,

निरन्तर नहीं, एक परिंदा हूँ मैं।

 

©रजनीश "स्वछंद"