मैं एक शोर हूँ।।

 

हुजूम का हिस्सा,

बिन सोच लिए,

मैं तो बस एक शोर हूँ।

चारों दिशाएं,

धरती-अम्बर,

मैं तो सुनो चहुँओर हूँ।

 

सुनाई दे जाता हूँ,

बड़े बड़े भोंपुओं से,

टीवी और अखबार में।

बीच सड़क, पताकों के बीच,

कभी संसद भवन में,

हां, कभी तो सरकार में।

 

बहुत सारे हैं रूप मेरे,

सत्ता के गलियारे में,

मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे में।

गेरुआ, हरा, सफेद,

कोई भी दे दो रंग,

हूँ समाया मैं सारे में।

 

बन भूख कभी होंठों पे आता,

बन विकास नभ में छाता,

खेतों में पानी का शोर हूँ।

बस कागज़ पे उकेरा जाता हूँ,

सच की धरातल दूर बड़ी,

बिन बारीश नाचता मोर हूँ।

 

अभी माहौल चुनावी है,

कार, ट्रक, और बसों पर,

दीवारों पर चिपका मिलता हूँ।

हसिया हथौड़ा तीर लालटेन,

हाथ साईकल और हाथी,

कमल सा खिलता मिलता हूँ।

 

बस चिन्ह बदलते रहते हैं,

स्वरूप मेरा तो एक रहा,

सच के हुए दर्शन ही नहीं।

मान कलंकित, मर्यादा कलंकित,

सबने मेरा साथ लिया,

पर सच दिखलाता दर्पण भी नहीं।

 

कोई जीते या हारे कोई,

खुशी के पल या मातम कोई,

हर हाल में जीत मैं जाता हूँ।

फिर नए सिरे से,

ले फिर से एक पुनर्जन्म,

कुछ पल बीत मैं आता हूँ।

 

सियासत हारी,

लियाक़त हारी,

कभी रात कभी भोर हूँ।

चारों दिशाएं,

धरती-अम्बर,

मैं तो सुनो चहुंओर हूँ।

 

©रजनीश "स्वछंद"