
मैं दर्द हूँ।।
मैं दर्द हूँ पिघला सा, आंखों से निकलता हूँ।
मैं बन अंगार कभी, होंठों से फिसलता हूँ।
ना मेरा कोई मज़हब, ना जात रही कोई,
फिर भी हर होंठों पर बस बात रही मेरी।
जो मैं जग में नहीं, खुशियों का मोल नहीं कोई,
जो दिल मे मैं ना रहूँ, है मीठी बोल नहीं कोई।
हर कोई फिक्र करे, बचते फिरते सब लोग,
सब मेरी ज़द में रहे, करते फिरते बस ढोंग।
महफ़िल में मुस्का कर, कोने में सिसकता हूँ।
मैं दर्द हूँ पिघला सा, आंखों से निकलता हूँ।
ना कोई एक ठिकाना है, रग रग में समाया हूँ,
कब छोड़ गया तुझको, जो लौट मैं आया हूँ।
हर सीख का मंतर हूँ, पूजा हवन भी
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