मैं दर्द हूँ।।
मैं दर्द हूँ पिघला सा, आंखों से निकलता हूँ।
मैं बन अंगार कभी, होंठों से फिसलता हूँ।
ना मेरा कोई मज़हब, ना जात रही कोई,
फिर भी हर होंठों पर बस बात रही मेरी।
जो मैं जग में नहीं, खुशियों का मोल नहीं कोई,
जो दिल मे मैं ना रहूँ, है मीठी बोल नहीं कोई।
हर कोई फिक्र करे, बचते फिरते सब लोग,
सब मेरी ज़द में रहे, करते फिरते बस ढोंग।
महफ़िल में मुस्का कर, कोने में सिसकता हूँ।
मैं दर्द हूँ पिघला सा, आंखों से निकलता हूँ।
ना कोई एक ठिकाना है, रग रग में समाया हूँ,
कब छोड़ गया तुझको, जो लौट मैं आया हूँ।
हर सीख का मंतर हूँ, पूजा हवन भी मैं।
ताबिज़ों का असर भी मैं, जोग जतन भी मैं।
मैं रोग नही कोई, जो छोड़ चलूं तुझको,
मैं तो कहर ठहरा, बस तोड़ चलूं तुझको।
मैं बन शीशा हर पल कानों में पिघलता हूँ।
मैं दर्द हूँ पिघला सा, आंखों से निकलता हूँ।
किस डर से डराते हो, मैं डर का साथी हूँ,
मदमस्त है चाल मेरी, जंगल का हाथी हूँ।
ना भूल सको कुछ तुम, मैं याद दिलाता हूं,
नीम की बेरी हूँ, जीने का स्वाद दिलाता हूं।
तुम भटको नहीं राहें, बन ठोकर आता हूँ,
कभी हंसने मैं तुझपे, बन जोकर आता हूँ।
तुम संग मेरे रह लो, कब कहाँ ठिठकता हूँ,
मैं दर्द हूँ पिघला सा, आंखों से निकलता हूँ।
©रजनीश "स्वछंद"


