मैं और मेरा इश्क।।
कुछ यूं बहा दरिया-ए-अश्क, बहता ही रह गया।
कुछ यूं सहा था दर्द-ए-दिल, सहता ही रह गया।।
मायूस खुद से रहे, न थामा हाथ बढ़कर किसी ने,
कुछ यूं खला साथ उनका, खलता ही रह गया।
तिनका तिनका चुनकर बनाया संवारा था जिसे,
कुछ यूं जला वो आशियाँ, जलता ही रह गया।।
तू ज़िन्दगी में शामिल, तू जन्नत, तू ही खुदा मेरा,
कुछ यूं कहा था दिल मेरा, कहता ही रह गया।।
मुंह तो मोड़ा था, साथ छोड़ा था कबका मेरा,
कुछ यूं छला था खुद को, छलता ही रह गया।।
राह-ए-मुहब्बत है आसां नही, है लंबी ये बड़ी,
कुछ यूं चला था इस पर, चलता ही रह गया।।
चाह छू लूं आसमां, ज़ेहन से काफ़ूर हो गयी,
कुछ यूं ढला शिखर से, ढलता ही रह गया।।
एक नई दुनिया, अपनी ज़मीं, आसमां अपना,
कुछ यूं सजा था ख्वाब, सजता ही रह गया।।
©रजनीश "स्वछंद"


