लुत्फ़-ए-इश्क।।
लुत्फ़-ए-इश्क कभी हो न कम, रकीबों का हौसला बढ़ाते गए।।।
दिल का टूटना तो होता है आम, दिल को बदस्तूर लगाते गए।।
था कुबूल नही, हो बेअदब बेगैरत, गिरना किसी के कदमों में।
दिल के टुकड़ों को ट्रॉफी की तरह, याददान में सजाते गए।।।
हो न जाये नासूर, हरा ज़ख्म कोई, मरहम का इंतज़ाम रखा।
कर बन्द यादों के दरवाजे झरोखे, हर तस्वीर जलाते गए।।
फ़कत एक नाज़ बाकी है कि अभी तलक भी जिंदा हैं हम।
वरना ये दुनिया वाले तो दर-ओ-दीवार में आग लगाते गए।।
©रजनीश "स्वछंद"


