क्यूँ लिखता हूँ मैं।।

 

है सोच नहीं मेरी कि बस लिखने को लिखता रहूं।

भाव भी नहीं ये कि भीड़ में अकेला दिखता रहूं।

 

कई दर्द मैं लिखता हूं, जो जी कर मैंने देखा है,

लिए ज़ख्म मैं फिरता हूँ, सी कर उन्हें देखा है।

ज़ज़्बातों की लहर भी है, आंखों का भी मोती है,

अंधेरी गुफ़ा ज़ालिम, मशालों की भी ज्योति है।

मुश्किल सा डगर भी है, कांटों का सफर भी है,

सरपट भागती दुनिया ये, रस्ते पे नज़र भी है।

चाह रही इतनी, मील का पत्थर बन दिखता रहूँ।

है सोच नहीं मेरी कि बस लिखने को लिखता रहूं।

 

बेचैन हुआ जो मैं, कागज़ पे सुकून तलाशूं,

ठंढे पड़े मन्द लहु में भी मैं ज़ुनूम तलाशु।

है बदला नहीं कुछ भी, पर चाह जरूरी है,

हो मंज़िल चाहे कोई, पर राह जरूरी है।

कल दर्द जो बोया था, मैं दर्द ही काट रहा,

जीवन के बिखरे कण, खुशियां मैं छांट रहा।

बन सबकी धड़कन मैं, सबके दिल मे टिकता रहूं।

है सोच नहीं मेरी कि बस लिखने को लिखता रहूं।

 

जो थाली सुनी है, है मुख में नहीं निवाला,

वाणी शीतल क्या हो, जो जले पेट में ज्वाला।

मैं भूख बनु कि निवाला, शब्दों को चुनता हूँ,

मन की अंगीठी में, एक एक दर्द मैं भुनता हूँ।

जो रोता रहा बचपन, बोलो प्यार कहाँ लिख दूँ,

जीवन का भरोसा क्या, इसका सार कहाँ लिख दूँ।

दिल की ये एक तमन्ना है, बन रोटी मैं सिंकता रहूं।

है सोच नहीं मेरी कि बस लिखने को लिखता रहूं।

 

था अफसोस रहा इतना कि मेरे शब्द अधूरे थे,

मेरी जर्जर इस लेखनी में, स्याही कब पूरे थे।

बस भाव रहा लिखता, जमीं भी टटोला था,

जो पांव रखा नीचे, न शबनम बस शोला था।

कुछ फीकी रही यादें, मिट पल में जाती थी,

जब दर्द ने दस्तक दी, लौट वो फिर से आती थी।

हैं कुछ ख़्वाब नहीं ऐसे, बन कागज़ मैं बिकता रहूँ।

है सोच नहीं मेरी कि बस लिखने को लिखता रहूं।

 

©रजनीश "स्वछंद"