क्या गारंटी है।।
सज़दे में सर झुका तो दूँ, कटेगा नहीं, क्या गारंटी है।
बहते पवन को रुका तो दूं, बहेगा नहीं, क्या गारंटी है।
सच और झूठ की उलझन में कैसे कोई मैं बात कहुँ,
सच मे ये दिल लगा तो दूँ, हटेगा नहीं, क्या गारंटी है।
ईमान हुआ सिक्का खोटा, अभी चला अभी बैठ गया,
बिकने को इसे सजा तो दूँ, छलेगा नहीं, क्या गारंटी है।
कोई दर्द बड़ा ही ज़ालिम है, मिटने से ज्यादा बढ़ता है,
मैं जो आज इसे मिटा भी दूँ, बढ़ेगा नहीं, क्या गारंटी है।
अपना ही साया दुश्मन अपना, अंतर्मन की लड़ाई है,
आज मैं सन्धि कर तो लूं, लड़ेगा नहीं, क्या गारंटी है।
कुछ बातें चुभीं दिल को ऐसे, ज़ख्म बड़ा ही गहरा था,
प्रत्यंचा तो मैं चढ़ा भी दूँ, तनेगा नहीं, क्या गारंटी है।
याद तो बच्चे होते हैं, वक्त के साथ ही बढ़ते जाते हैं,
यादों को आज भुला भी दूँ, पलेगा नहीं, क्या गारंटी है।
कंकड़ पत्थर और तिनका, मन मे घर की चाह रही,
नींव तो पक्की कर भी दूँ, ढहेगा नहीं, क्या गारंटी है।
मन मे कुछ अवसाद लिए, बर्फ़ हुआ था दिल भी मेरा,
मैं आज इसे पिघला भी दूँ, जमेगा नहीं, क्या गारंटी है।
हर बात मैं सच ही कहता हूं, किस्सा ये तेरा मेरा है,
दिल पे दस्तक जो दे दूं, धड़केगा नहीं, क्या गारंटी है।
©रजनीश "स्वछंद"


