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क्या गारंटी है।।_रजनीश "स्वच्छंद"

क्या गारंटी है।।

 

सज़दे में सर झुका तो दूँ, कटेगा नहीं, क्या गारंटी है।

बहते पवन को रुका तो दूं, बहेगा नहीं, क्या गारंटी है।

 

सच और झूठ की उलझन में कैसे कोई मैं बात कहुँ,

सच मे ये दिल लगा तो दूँ, हटेगा नहीं, क्या गारंटी है।

 

ईमान हुआ सिक्का खोटा, अभी चला अभी बैठ गया,

बिकने को इसे सजा तो दूँ, छलेगा नहीं, क्या गारंटी है।

 

कोई दर्द बड़ा ही ज़ालिम है, मिटने से ज्यादा बढ़ता है,

मैं जो आज इसे मिटा भी दूँ, बढ़ेगा नहीं, क्या गारंटी है।

 

अपना ही साया दुश्मन अपना, अंतर्मन की लड़ाई है,

आज मैं सन्धि कर तो लूं, लड़ेगा नहीं, क्या गारंटी है।

 

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