क्या दौर है ये, किस मोड़ पे हम।।
क्यूँ आज, अपने भी बेगाने लगते हैं।
अपनेपन की बातें भी फ़साने लगते हैं।
हमने तो यूँ ही मधुमखियों को छेड़ा था,
उन डंक भी अब तो हमें हंसाने लगते हैं।
दौलत की दुनिया है, सोहरत की दुनिया,
अब तो खाली जेब भी डराने लगते हैं।
सिक्कों की खनक में आवाज़ गुम है,
अब मुस्कराते चेहरे भी बहाने लगते हैं।
मैं से हम का सफर हुआ मुश्किल बड़ा,
किताबी बातें बस अब सिरहाने रखते हैं।
हमने तो श्रद्धा से झुकाया था सर अपना,
लोग सरेआम हमे कायर बताने लगते हैं।
लोहे को काटता है लोहा, सच ही होगा,
दर्द की दवा दर्द, खुद को समझाने लगते हैं।
बगावती है दिल, आज़ाद होना चाहे,
खुद के अपने हैं खुद, जताने लगते हैं।
अपने ही दर्द में तो रोया बहुत मैं,
औरों के दर्द भी अब सताने लगते हैं।
अपनो की फेहरिस्त है लंबी पर खाली,
खुद के साये ही गले से लगाये रखते हैं।
©रजनीश "स्वछंद"


