किस मुख कविदम्भ भरूँ।।।

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किस मुख कविदम्भ भरूँ।।।
लोकतंत्र तो ज्ञान का ही पर्याय है,
बगैर ज्ञान तो ये बस असहाय है।
मति जो ना रही, राजनीति क्या,
बिन संस्कारों के कोई रीति क्या।
जात में मज़हबों में बंटे हम पड़े,
जहाँ से चले थे हैं वहीं हम खड़े।
काबिल नही बस जनबल चाहिए,
हाथ हसिया तीर औ कमल चाहिए।
इंसानियत बैठ कोने रोती कहीं,
मशाल लौ बूझकर है सोती कहीं।
बस मंदिर मस्जिद की है खबर,
भूखा पेट फिर भी करेगा सबर।
आरक्षण मिले, मुफ्तखोरी चले,
ज्ञान की तो यहां बस होली जले।
सरस्वती है दर पे भीखारण बनी,
भैंसों की ही बस भैंसों से है ठनी।
लाठियां, तलवार गोली बंदूक बस,
दुर्जन ही लिए घूमता है यहां यश।
किसकी चिंता किसे है सताती यहां,
किताबें अलमीरों में हैं लजाती यहां।
जो पलटे भी पन्ना, वो भी मगरूर है,
वक़्त बदला, वो इससे कोसों दूर है।
मार्क्स लेनिन की अलख बुझी अब,
औरों की किसे कब कहाँ सूझी अब।
संसद में सज्जन होना अपवाद हुआ,
सत्ता का आशय तो परिवारवाद हुआ।
गोरों की गुलामी छोड़ कहाँ आये हैं,
रंग बदला, पर वैसे ही काले साये हैं।
रही लेखनी भी अब निर्भीक नही,
बताए राह, बनाती अब लीक नहीं।
जंगल का है कानून, जंगल का राज है,
दिनकर सा लिखता कहाँ कोई आज है।
देशहित छोड़, लेखनी भी लक्ष्मी की दास है,
किस मुख कविदम्भ भरूँ, ये तो उपहास है।
©रजनीश "स्वछंद"
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