कलम मेरी उदास है।।
आज कलम मेरी उदास है।
बस लिखने का ही अहसास है।
सच से कब था सामना,
लिख रहा बस झूठी आस है।
आज कलम मेरी उदास है।।
जिससे द्रवित थीं आंखें कभी,
देख उसे आज अट्टहास है।
आज कलम मेरी उदास है।।
थी बस राम राज्य की कल्पना,
वहीं आज रावणों का वास है।
आज कलम मेरी उदास है।
हर द्रौपदी है लज्जित खड़ी,
कृष्ण खड़ा देखता उपहास है।
आज कलम मेरी उदास है।।
भाई भी भाई से लड़ रहा,
कलुषित स्वजन का पाश है।
आज कलम मेरी उदास है।।
धर्म क्या, है अधर्म क्या।
ये कर रहा मनुज का नाश है।
आज कलम मेरी उदास है।।
कल था जिसपर गर्व सबको,
मानव हुआ उसी का ग्रास है।
आज कलम मेरी उदास है।।
रहा भागता हर दर्द से,
आज सिवा इसके क्या पास है।
आज कलम मेरी उदास है।।
©रजनीश "स्वछंद"


