कहाँ है आज आदमी।।


चुपचाप क्यूँ खड़ा है, यहाँ आज आदमी,

मुँह तोप क्यूँ पड़ा है, यहाँ आज आदमी।


है जान तो रहा मगर है बोलता नहीं,

क्यूँ मौन ही जड़ा है, यहाँ आज आदमी।


इस नज़र ही सब घटा, नहीं है कुछ बचा।

मुँह गाड़ चल पड़ा है, यहाँ आज आदमी।


ये दर्द का सबब ही कहाँ देखता चला,

है आह, कब अड़ा है यहाँ आज आदमी।


है आदमी रहा मगर है झुंड ही रहा,

हर बात क्यूँ लड़ा है यहाँ आज आदमी।


हर बात जानता है ज़रा पूछ देख लो,

किस राह पर बढ़ा है यहाँ आज आदमी।


सच का रहा न मोल, सज बाज़ार बिक रहे,

क्यूँ झूठ ही गढ़ा है यहाँ आज आदमी।


कोई दया न धर्म अब है जानता सुनो,

क्यूँ ईश बन पड़ा है यहाँ आज आदमी।


तख़्ती लगा चला है महज़ शोर ही रहा,

क्यूँ भीड़ का धड़ा है यहाँ आज आदमी।


है रो रही धरा गगन भी आँख भर चला,

रजनीश तू बता है कहाँ आज आदमी।


©रजनीश "स्वछन्द"