कदमों में शीश चढ़ा कर आया हूँ।।

 

कदमों में शीश चढ़ा कर आया हूँ,

मैं वन्दे मातरम गाऊंगा।

कद तेरा जग में बढ़ा कर आया हूँ,

मैं वन्दे मातरम गाऊंगा।

 

तेरा दूध लहू बन दौड़े रग में,

यौवन भी तुझपे वार रहा।

है खेद जरा जयचंदों की,

हिम्मत फिर भी न हार रहा।

 

तू जननी, तू माता मेरी,

विश्वकर्मा रचनाकार तू ही।

तू ही भाल का चन्दन है,

कुंडल कवच श्रृंगार तू ही।

 

तेरी आभा ही लिए चले हम,

निशा-दिवस और चार पहर।

ये धरती तेरी, अम्बर तेरा,

कस्बा नगर और गांव शहर।

 

जीवन तेरे नाम करा कर आया हूँ,

मैं वन्दे मातरम गाऊंगा।

कदमों में शीश चढ़ा कर आया हूँ,

मैं वन्दे मातरम गाऊंगा।

 

ये भुजा तेरी, ये भुजबल तेरा,

शत्रुबल क्षीण कर आया हूँ।

शत्रुदलन का भाव लिए मैं,

रिपु को दीन कर आया हूँ।

 

तेरे शौर्य की मादकता में,

बन गज रण में झूमा हूँ।

मुंडमाला लिए गले मे,

हो रौद्र शत्रुदल में घूमा हूँ।

 

आंख न कोई उठने पाए,

सजग तेरे संतान खड़े हैं।

सहिष्णु तो हम रहे सदा,

कर में तीर-कमान पड़े हैं।

 

शोणित से लाल धरा कर आया हूँ,

मैं वन्दे मातरम गाऊंगा।

कदमों में शीश चढ़ा कर आया हूँ,

मैं वन्दे मातरम गाऊंगा।

 

©रजनीश "स्वछंद"