जहर बो रहा हूँ।अंतर्वेदना।।
जहर में पला हूँ, जहर बो रहा हूँ,
सुनो तुम कहानी बड़ा हो रहा हूँ।
ज़मीं पाँव मेरे न टिकते सुनो तुम,
चला रौंदता सब खड़ा हो रहा हूँ।
कही बात सबने मगर कौन माने,
बड़ी गूढ़ बातें, कहो कौन जाने।
न तुमने बताया न ही मिल जताया,
न सोचा कभी कुछ, लगे आज़माने।
कहानी यही है, सुनो ये तुम्हारी।
नहीं ज्ञान जो है, रहा मान भारी।
रहे वाचते पर, बिना पैर सिर के,
मगर चाहते बस, सुनें सब हमारी।
मिले राह अपने, छुपा हाथ खंज़र,
कहाँ प्रेम उपजा, धरा देख बंजर।
बहुत बाट जोहा, उमर कट गई है,
समय साथ लाया, वही आज मंज़र।
बहुत भागता हूँ, न परवाह सच की,
नहीं कान सुनता, सुनो आह सच की।
न अपने कहीं थे, कुचल जो चला था,
बहुत झूठ ढोया, भुला राह सच की।
तड़प क्या करूँ अब, लहू चाटता मैं,
रहा बो चला जो, वही काटता मैं।
रहे हाथ खाली, नहीं कुछ बचा है,
न पाया जिसे वो कहाँ बाँटता मैं।
कलम आज कहती, जगे सो रहा हूँ,
मिला आसमां है, मगर रो रहा हूँ।
किसे आज कह दूँ, किसे जा बताऊँ,
जहर में पला हूँ, जहर बो रहा हूँ।
©रजनीश "स्वछन्द"


