जो निकले कदम दहलीज़ से, हर नैन मुझको घूरते। राखी बंधे अब हाथ भी, शिकार अपना ढूंढते।।। कब तलक यूँ रहूं मौन, इंसां हूँ, कोई पत्थर नही। मेरे उजड़े स्वप्न भी प्रतिकार अपना ढूंढते।।।