हर डाल पर उल्लू बैठा है।।
हर डाल पर उल्लू बैठा है, परवाह किसे इस गुलशन की।
मैं से हम हो न सके, कहानी आम रही बस अनबन की।
तन की सुंदरता में खोए थे, न झांका कभी मन के अंदर,
मन जो सुंदर हो जाये तो फिर तलब रहे क्या दर्पण की।
फ़न काढ़े स्वार्थ है बैठा, मैं मेरा का ही बस झगड़ा रहा।
दो बोल ही शीतल कर जाएं, दरकार रहे क्या चन्दन की।
हर किताब के पन्ने पलटे, पर सच की खोज अधूरी थी,
जिस दिन खोजा खुद को मैंने, मूरत पायी जन जन की।
हर्ष कहीं था दुबका बैठा, उल्लास क्षितिज के पार रहा,
माली सींचे बगिया हर दिन तो चाह रही क्या उपवन की।
हाथों की लकीरें छोड़ कहीं, काम जरा जब इनसे लोगे,
हर रेखा फिर दिखेगी सीधी, जगह कहां फिर उलझन की।
मन को तुम निर्मल कर लो, सारी दुनिया ये अपनी होगी,
अंतर्मन को घिस कर देखो फिर कहां ज़रूरत उबटन की।
©रजनीश "स्वछंद"


