
हर डाल पर उल्लू बैठा है।।
हर डाल पर उल्लू बैठा है, परवाह किसे इस गुलशन की।
मैं से हम हो न सके, कहानी आम रही बस अनबन की।
तन की सुंदरता में खोए थे, न झांका कभी मन के अंदर,
मन जो सुंदर हो जाये तो फिर तलब रहे क्या दर्पण की।
फ़न काढ़े स्वार्थ है बैठा, मैं मेरा का ही बस झगड़ा रहा।
दो बोल ही शीतल कर जाएं, दरकार रहे क्या चन्दन की।
हर किताब के पन्ने पलटे, पर सच की खोज अधूरी
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