है कौन सा रँगरेज ये।।

 

जमीं लहु से रंग रहा, है कौन सा रँगरेज ये।

मज़हबी दुकान पे सजाए है कुर्सी मेज ये।।

 

फ़न निकाले बैठ कर, है दीये को ढंक रहा,

दमकते सूर्य को भी कर रहा निस्तेज ये।

 

कुछ इधर और उधर भी, फासले बढ़ते गए,

नँगा रखा जो गला, नस्तर कर रहा तेज ये।

 

इंसानियत है बिक रही, नाम मे बंटती गयी,

बना रहा हो मौन कौन मृत्युशय्या का सेज ये।

 

राम कहो, अल्लाह कहो, मतलब तो एक है,

अपनो से अपनो को क्यूँ हो रहा परहेज ये।

 

कह कह मैं हारा जाता हूँ, शब्द नहीं शेष है,

शायद बदलती दुनिया का है एक फेज ये।।

 

©रजनीश "स्वछंद"