दोहे।। (समीक्षार्थ)
दुर्जन कब सज्जन हुआ, कितना दे दो लूर।
लाख छलाँगे मारता, है दिल्ली तो दूर।।
बाप न मारे मेढकी, बेटा तीरंदाज।
नाथ बने हैं घूमते, माथ सजाये ताज।।
उसकी मत सुन बैठिये, अल्प रहा जो ज्ञान।
ज्यों अंडा मुर्गी कहे, देकर चल तू ध्यान।।
नेता सेवक कब हुआ, देता बात बनाय।
अंधा बाँटे रेवड़ी, फिर फिर निज ही खाय।
बंजर मूरख माथ है, ज्ञान रहा क्यूँ बोय।
अंधा सम्मुख रो रहा, अपना दीदा खोय।
वोट दिया घर जाइये, पलट पढ़ें इतिहास।
ईश भजन घर से चले, ओटन लगा कपास।
©रजनीश "स्वछन्द"
