दिल की बात बताता हूँ

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दिल की बात बताता हूँ।।
कुछ सहा नहीं, कुछ कहा नहीं,
चुप भी मैं तो रहा नहीं।
दीवार पे लिखीं थीं कुछ बातें,
जानबूझ मैं पढ़ा नहीं।
ख्वाबी पुलाव पकाने को,
जो एक इमारत गढ़नी थी।
पग पग कांटे बोये थे,
पर सीढ़ी तो चढ़नी थी।
मौन रहा, चुपचाप रहा,
मेरा क्या और मुझको क्या।
जब आन पड़ा ये सर पर बोझा,
मैं ढोउँगा तुझको क्या।
जब मैं दर्द में जलता था,
तू हंसता, हाथ मैं मलता था।
समय बड़ा ही सुंदर है,
ये अब भी, तब भी चलता था।
तेरी ख़ातिर खड़ा हुआ जो,
तुमने हाथ बढ़ाया कब था।
पूजा की थाली थी सूनी,
तुमने फूल चढ़ाया कब था।
मेरा रस्ता, तेरा रस्ता,
दोनों आज अलग लगते हैं।
तू तेरी जाने और मैं मेरी,
दोनों अलग अलग बढ़ते हैं।
तू क्यूँ मेरी ख़ातिर मरता,
मैं क्यूँ तेरी ख़ातिर।
बैठे रहे हम बाट जोहते,
निकला समय ये शातिर।
बीत गया जो लौट न आये,
सच मे ज्ञान बड़ा है।
जो बढ़ता रहा वो बढ़ता गया,
तू अब भी वहीं खड़ा है।
मैं रहा स्वार्थी, अपनेपन का,
नित ढोंग रचाता रहता हूँ।
सच की है क्या फिक्र मुझे,
झूठे महल सजाता रहता हूँ।
बन ढोंगी सच मैं कहता हूं,
हंसते हंसते दिल की बात कहूँ।
है मनुज घर मे जन्म लिया,
किस मुख अपनी जात कहुँ।
दिल कहता है,
लिख जाऊं, और लिखूं।
शब्दों की मर्यादा है,
ज्यादा बोलो क्या मैं लिखूं।
©रजनीश "स्वछंद"
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