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बून्द शराब का।।_रजनीश "स्वच्छंद"

बून्द शराब का।।

 

पैमानों से छलक मैं जाता हूँ, चुम ज़मीं मैं ज़िंदा हूँ,

ललक रही उड़ने की मगर बिन पर का मैं परिंदा हूँ।

 

उनकी जुबां तक कब पहुंचा, ना मैं पहुंचा न दर्द मेरा,

फेहरिस्त रही लम्बी उनकी, बेगानों सा था फ़र्द मेरा।

कदमों के तले रौंदा भी गया, सूखा जमीं की दरारों में,

एक बूंद रहा दरिया तो नहीं, कब उलझा मैं किनारों में।

पल भर की थी मेरी कहानी, पल भर ही शर्मिंदा हूँ,

ललक रही उड़ने की मगर बिन पर का मैं परिंदा हूँ।

 

एक बूंद रहा क्या कर पाया, न नशा रही न रवानी थी,

छलका जो इस धरती पर मैं पल भर की ही ज

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