बून्द शराब का।।

 

पैमानों से छलक मैं जाता हूँ, चुम ज़मीं मैं ज़िंदा हूँ,

ललक रही उड़ने की मगर बिन पर का मैं परिंदा हूँ।

 

उनकी जुबां तक कब पहुंचा, ना मैं पहुंचा न दर्द मेरा,

फेहरिस्त रही लम्बी उनकी, बेगानों सा था फ़र्द मेरा।

कदमों के तले रौंदा भी गया, सूखा जमीं की दरारों में,

एक बूंद रहा दरिया तो नहीं, कब उलझा मैं किनारों में।

पल भर की थी मेरी कहानी, पल भर ही शर्मिंदा हूँ,

ललक रही उड़ने की मगर बिन पर का मैं परिंदा हूँ।

 

एक बूंद रहा क्या कर पाया, न नशा रही न रवानी थी,

छलका जो इस धरती पर मैं पल भर की ही जवानी थी।

पैमाने का दोष नहीं, था दोषी भी नहीं वो हाथ कांपता,

पल भर में मैं सूखा, था वक़्त कहाँ जो खुद को नापता।

फ़ख्र रहा बस इतना कि मधुशाला का बासिन्दा हूँ,

ललक रही उड़ने की मगर बिन पर का मैं परिंदा हूँ।

 

मेरा कोई नाम नहीं था, तुम राम कहो या रहीम कहो,

छल नहीं कोई कपट नहीं, कृष्ण कहो या फ़हीम कहो।

तेरा चोला था रहा बदलता, मैं तो बस एक बूंद रहा,

गिरता मुझको देखा तुमने, पर तु बस आंखें मूंद रहा।

ना धर्म रहा मेरा कोई, अभी अल्लाह अभी गोविंदा हूँ,

ललक रही उड़ने की मगर बिन पर का मैं परिंदा हूँ।

 

©रजनीश "स्वछंद"