बात सुनो।।
उनकी भी तो तुम बात सुनो,
वाणी है ये सौगात सुनो।
सब हार रहे भगवन तक तक,
जा पल को तो हालात सुनो।
कल कैसा था कल क्या होगा,
पल कैसा था पल क्या होगा।
तुम अहर पहर क्या सोच रहे,
चल आओ चल दिन रात सुनो।।
साँसें भी देखो अटक रहीं,
धरती जा माथा पटक रहीं।
देखो जीवन है फिसल रहा,
थामे रहना तुम हाथ सुनो।।
कब देव खड़ा तेरी ख़ातिर,
कब देख लड़ा तेरी ख़ातिर।
नर आज नरोत्तम होना है,
हो क्यूँ अपनी अब मात सुनो।।
बंजर न धरा थी पहले तो,
करनी अपनी अब सह ले तो।
जग प्रबल सबल तुझसे होता,
मेरे भैया मेरे तात सुनो।।
है कौन अरि कहाँ वार रहा,
तू जो बिखरा तू हार रहा।
बैरी सोचो है कौन यहॉं,
तज तुम सारे अब जात सुनो।
तू है तो दुनिया कायम है,
करनी बैठा फिर क्यूँ यम है।
मानव जीवट जग पूरक है,
मानवता कब है घात सुनो।
सबका होना तेरा होना,
क्यूँ वंचित हो कोई कोना।
जो हैं बैठे अधिकार रहित,
चल उनके भी जज़्बात सुनो।
जंगल पर्वत कोठी छप्पर,
कोई नीचे कोई ऊपर।
सारे तेरे तो अपने हैं,
चल शहर सुनो देहात सुनो।
लिखती जाती अब कलम कहे,
हमने तुमने क्या क्या न सहे।
है बहुत हुआ अब तो सोचो,
मिलकर चलते अब साथ सुनो।
©रजनीश "स्वछन्द"
