
बन जाऊं मैं शायर, लिख डालूं ग़ज़ल भी, तू जुल्फें जो यूँ लहराती रहे।।
बन जाऊं में नदिया, बन भी जाऊं समंदर, जो उसमे तू डुबकी लगाती रहे।।
ख्वाब तेरा बनु, नींद भी में बनु, जो तू पलकें यूँ ही झपकाती रहे।।
बन जाऊं मैं कागज़ , कलम भी बनु, जो तू अफ़साने यूँ ही सुनाती रहे।।
काफिर बनु, या बन जाऊं खुदा, जो तू सज़दे के गीत गाती रहे।।
बन जाऊं में बालम, या सैयां बनु, जो तू पलकों पे सेज सजाती रहे।।।
तेरा पल्लू बनु, चुनरी बनु, ओढ़ अगर तू उसे इतराती रहे
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