अपनी लाश लिए मैं चलता हूँ।।
अपने कंधों पर अपनी लाश लिए मैं चलता हूँ।
हाथों में ही खुद का विनाश लिए मैं चलता हूँ।
मंदिर मस्ज़िद और गुरुद्वारों में बांटा जाता हूँ,
निजसंग परिचय अपना खास लिए मैं चलता हूँ।
मैं ठगा गया मैं छला गया पग पग धोखे खाये हैं,
निज्मन के हर कोने में उपहास लिए मैं चलता हूँ।
जिसको अपना बोला था, बदले बदले से लगते हैं,
दिल मे उनके तंज का अट्टहास लिए मैं चलता हूँ।
बन्धन में भी बांधा मैं गया, रिश्ते की बेड़ी पड़ी रही,
अनजानों की दुनिया मे मोहपाश लिए मैं चलता हूँ।
कहने को तो एक टुकड़ा धरती का मेरा भी था,
पांव जमीं पे टिके नहीं आकाश लिए मैं चलता हूँ।
प्रतिकूल आंधी में टीम टीम करता एक दीपक हूँ,
कइयों ने मारे फूंक मगर, आस लिए मैं चलता हूँ।
ताने सुनने को कम न मिले, सोच रही विद्रोही थी,
चुभती बातें सह खुद को हताश लिए मैं चलता हूँ।
कोई कभी तो सुन लेगा, आह मेरे भी शब्दों की,
अपनी ये कलम हमेशा पास लिए मैं चलता हूँ।
©रजनीश "स्वछंद"


