अंक।।

 

मनुज मनुज तो रहा नही, एक अंक मात्र बस शेष है।

ललक नही सनक नही, हाड़ माँस का बस अवशेष है।।

 

जन्म अंक, बचपन अंक,

किशोर अंक, यौवन भी अंक।

प्रौढ़ावस्था, वृद्धावस्था,

जीवन अंक, मरन भी अंक।।

मनुज अंकों का गणित बना है,

मौन खड़ा दिग्भ्रमित बना है।

किस ओर है जाना किस ओर चला है,

गुजरता वक़्त भी बहुत खला है।

क्यूँ पछताए जो चिड़िया चुगती खेत रही,

जीवन हाथों से मानो फिसलती रेत रही।

मूक रहा, मील का पत्थर था,

अभी सात तो पल में सत्तर था।

समय बीतते लगे न देर,

बस रात रही, न हुआ सवेर।

चक्र वही बस चलता है,

सूरज उगता और ढलता है।

वेदों की गाथा बस पाती में,

गिनता निज को पशु प्रजाति में।

कभी ज्ञान के खुले जो चक्षु,

जी चाहे फिर सब मैं कह दूं।

स्वयं को कहता दक्ष बड़ा है,

सवाल वही बन फिर यक्ष खड़ा है।

अकेला चना भाड़ कहाँ कब फोड़ता,

स्वार्थसिद्धि मन को कहाँ कब छोड़ता।

फिर ढाक के बस वही दो पात,

आई गई और बीती बात।

जीवन फिर अंकों पे आकर अटका है,

दो को कैसे चार करूँ, मन इसमें ही भटका है।

लालच सर चढ़ बोल रहा, पनपता मन मे बस द्वेष है।

मनुज मनुज तो रहा नही, एक अंक मात्र बस शेष है।

 

रजनीश "स्वच्छंद"