आह ज़िन्दगी।।


हाँ ठहरा सा पानी है ज़िन्दगी,

बेबस एक कहानी है ज़िन्दगी।।


देखो दौड़ो भागो तुम अनवरत,

फिर वापिस लौटानी है ज़िन्दगी।।


निर्मोही मोहक है सुंदर बड़ी,

पर हाथ झटक जानी है ज़िन्दगी।।


हलचल बेकाबू पर दिखता कहाँ,

अंदर से तूफ़ानी है ज़िन्दगी।।


हार तमाशा सर्कस, उलझी पड़ी,

अब लगती बेमानी है ज़िन्दगी।।


क्रंदन कोलाहल निज-अभिशाप सी,

सबको आज बतानी है ज़िन्दगी।।


ज्ञान अज्ञान सभी बौने से खड़े,

हम सबने कब जानी है ज़िन्दगी।।


भींची मुट्ठी, सर सर है सरकती,

सच है बहुत सयानी है ज़िन्दगी।।


बहुरूपिया, धोखा है हर चेहरा,

दुनिया ये अनजानी है ज़िन्दगी।।


अल्हड़ नखरीली मनमौजी बड़ी,

क्या दरिया का पानी है ज़िन्दगी।।


©रजनीश "स्वछन्द"